Had the privilege to attend and participate in a function organised to raise voice against female foeticide
something i wrote :
मैं बेटे का साहारा ना सही , बेटी का प्यार तो हूँ
बेटे का चुलबुलापन ना सही बेटी का भोलापन तो हूँ
बेटा चंद रुपये कमा लाता है जानती हूँ
पर दो वक़्त की रोटी बना मैं ही तो खिलती हूँ
कंजक पर पूज कर मुझे अगले ही दिन भूल जाते हो
अपनी माँ से इतना प्रेम है तुम्हे , है वो भी औरत ही , ये क्यूँ भूल जाते हो??
रक्षा का धागा भी को बांधती हूँ , कमज़ोर हूँ शायद
पर दुर्गा बन सारे दुःख मैं ही तो हरने आती हूँ
यह सोच के पराया करते हो , दुसरे घर जाउंगी , मेरा प्यार बट जायेगा
यह क्यूँ भूल जाते हो की बेटा भी तो बहू लायेगा
अभी तो तुम्हे देखा भी नहीं माँ
अभी से मेरी ये आँखें बंद ना करो
अभी तो तुम्हे इन हाथों से छुआ भी नही मैंने
अभी से इन हाथों को मुझसे अलग ना करो
अभी तो तुम्हे माँ कह कर पुकारा भी नहीं मैंने
अभी से ये आवाज़ बंद ना करो
अभी तो गोद में लिया भी नहीं तुमने
अभी से अपनी ममता से वंचित ना करो
अभी से अपनी ममता से वंचित ना करो
